पंखों में हमेशा दो वाइंडिंगो का उपयोग क्यों किया जाता है ? तथा साथ ही हमेशा इसके साथ कैपिसिटर का उपयोग क्यों किया जाता है ?

पंखों में हमेशा दो वाइंडिंगो का उपयोग क्यों किया जाता है ? तथा साथ ही हमेशा इसके साथ कैपिसिटर का उपयोग क्यों किया जाता है ?

दोस्तों आप अपने घरों में पंखों का उपयोग तो करते ही होंगे, खासकर गर्मियों के दिनों में, पर दोस्तों आपने कभी यह जानने की कोशिश की, कि आखिरकार यह पंखे चलते कैसे हैं ?

आपने कभी ना कभी किसी इलेक्ट्रिक शॉप पर किसी इलेक्ट्रीशियन को पंखा रिपेयर करते तो जरूर देखा होगा तथा इसके साथ ही आपने पंखे में उपयोग हुए दो तरह के वाइंडिंग को जरूर देखा होगा ( आप नीचे की चित्र देखकर यह समझ सकते हैं ) । इसे देखकर आपके मन में एक सवाल तो जरूर आया होगा कि आखिर पंखे में दो वाइंडिंगो का यूज क्यों किया जाता है ? आज हम इसी प्रश्न का उत्तर जानने की कोशिश करेंगे ।

दोस्तों हमारे घर में उपयोग होने वाले पंखे में सिंगल फेज से चलने वाली इंडक्शन मोटर होती है । यह इंडक्शन् मोटर्स सेल्फ स्टार्टिंग नहीं होती यानी कि इन वोटरों को चलाने के लिए पंखे में कुछ अलग अरेंजमेंट की जाती है । 

सिंगल फेज मोटर में रनिंग टॉर्क ( फ़ोर्स ) तो होता है पर इसे चलाने के लिए स्टार्टिंग टॉर्क नहीं होता । और इसी स्टार्टिंग टॉर्क को हम इन दोनों वाइंडिंगो के सहयोग से प्राप्त करते हैं । किसी भी सिंगल फेस मोटर की तरह ही सीलिंग फैन में 2 पार्ट होते हैं ( 1 ) स्टेटर ( 2 ) रोटर ।

( 1 ) स्टेटर [ upper red box ], ( 2 ) रोटर [ lower red box ]
( 1 ) स्टेटर [ upper red box ], ( 2 ) रोटर [ lower red box ]

स्टेटर वह पार्ट होता है जो घूमती नहीं है तथा इन्हीं स्टेटरों में ही पंखे के मुख्य 2 वाइंडिंग्स होते हैं । दूसरा पार्ट है रोटर , रोटर वह पार्ट है जो स्वतंत्र रूप से घूम सकता है । स्टेटर में मौजूद वाइंडिंगो में अंदर की वाइंडिंग पंखे को लगातार घूमते रहने में मदद करती है , परंतु सबसे ऊपरी वाइंडिंग पंखे को शुरुआत में चलाने के लिए जरूरी स्टार्टिंग फ़ोर्स उत्पन्न करने में मदद करती है ।

दोस्तों हम इन वाइंडिंगो के कार्य सिद्धांत पर थोड़ा और बात करते हैं । इसे हम अच्छी तरह से समझ सकें इसके लिए हम एक छोटे से उदाहरण से इसे समझने की कोशिश करते हैं । 

मान लीजिए हमने एक स्टेटर के समान ही एक सिंगल वाइंडिंग ( कॉइल ) वाले एक स्टेटर को लिया । इस स्टेटर के वाइंडिंग कॉइल के एक सिरे को AC सप्लाई के फेज तथा दूसरे सिरे को न्यूट्रल से कनेक्ट करते हैं । जैसा कि आप चित्र में देख सकते हैं ।

सिंगल वाइंडिंग ( coil ) में S - N ध्रुव
सिंगल वाइंडिंग ( coil ) में S - N ध्रुव 

हम देखते हैं कि जब कॉइल्स में विद्युत धारा प्रवाहित होती है तब स्टेटर के एक छोर पर चुंबकीय S ध्रुव तथा दूसरी पर N ध्रुव बनते हैं । हम यह जानते हैं कि एसी करंट लगातार अपनी दिशा बदलते रहते हैं । यह एक पल में पॉजिटिव ( + ) तो ही दूसरे पल में नेगेटिव ( - ) होता रहता है तथा यह प्रक्रिया हर 1 सेकेंड में 50 बार होती है । 50 बार इसलिए क्योंकि भारत में प्रयोग आने वाली विद्युत की फ्रीक्वेंसी 50hz का होती है । उस हिसाब से स्टेटर में उत्पन्न हुई S और N ध्रुव लगातार अपनी जगह पर नहीं बने होंगे । यह भी एक सेकेंड में 50 बार के हिसाब से ऊपर - नीचे होते रहेंगे । 

इससे होगा यूं कि स्टेटर में उत्पन्न N ध्रुव जैसे ही रोटर को आगे घुमाना शुरू करेगा, विद्युत के फ्रीक्वेंसी के कारण N ध्रुव S ध्रुव में परिवर्तित हो जाएगा और यह S ध्रुव आगे जा रहे रोटर को फिर से पीछे की ओर धक्का देना शुरू कर देगा । और यह आगे - पीछे की स्थिति 1 सेकेंड में 50 बार के हिसाब से लगातार चलती ही रहेगी । इसे सिंपल शब्दों में कहें तो स्टेटर एक ही जगह पर वाइब्रेट करती रहेगी । इसी स्थिति से निपटने के लिए हम इस स्टेटर में एक और कॉइल को लगाते हैं जोे इस कॉइल बिल्कुल परपेंडिकुलर होगी ( आप नीचे चित्र देख सकते हैं ) 

2 कॉइल में S - N ध्रूव
2 कॉइल में S - N ध्रूव

इस कॉइल को हम उसी कॉइल के पैररल कनेक्शन में कनेक्ट कर देते हैं पर इससे भी हमारी समस्या खत्म नहीं होती है । विद्युत का माध्यम एक ही होने की वजह से इस कॉइल में भी पहले वाले कॉइल की तरह ही एक ही समय में एक साथ या तो N ध्रुव बनेगा या तो S ध्रुव । ऐसी स्थिति में भी रोटर का घूमना असंभव है ।

रोटर को सुचारू रूप से चलाने के लिए हमे एक और युक्ति का इस्तेमाल करना होगा , और वह है कंडेनसर । दोस्तों हम रोटर को तभी सुचारू रूप से चला सकते हैं जब स्टेटर में मौजूद दोनो कॉइलो में से एक कॉइल, दूसरे कॉइल से विपरीत धुव बनाये । और यही काम करता है हमारा कंडेनसर, कंडेनसर को हम हमेशा स्टेटर के अंदर वाले कॉइल यानी की छोटी कॉइल के साथ एक सीरीज में कनेक्ट कर देते हैं । ( नीचे का चित्र देखें ) 

कंडेन्सर ( in blue box )
कंडेन्सर ( in blue box )

जब इस कंडेनसर से विद्युत धारा गुजर कर अंदर के कॉइल  तक पहुंचती है तब यह बाहरी कॉइल और अंदुरुनी कॉइल के  ध्रुव एक समान नहीं होते , यानी की अंदर के क्वायल में जब एक हिस्से में S ध्रुव बन रहा होगा तब बाहरी कॉइल के एक हिस्से में N ध्रुव बन रहा होगा । और इन्हीं ध्रुवों में आये अंतर के कारण रोटर सही दिशा में बिना किसी बाधा के लगातार घूमना शुरू कर देता है । ( ज्यादा समझने के लिए आप नीचे दिए गए एनीमेशन को देखें )

उदाहरण के लिए हमने दो कॉइलो को उपयोग में लिया लेकिन वास्तविक पंखे में इन दोनों कॉइलो की जगह छोटे - छोटे हैं बहुत सारे कॉइलो का उपयोग किया जाता है । यह इसलिए क्योंकि अगर हम इन छोटे-छोटे कॉइलो को उपयोग में नहीं लाते तो कम कॉइलो की वजह से रोटर एकदम से स्पीड घूमने लगेगा तथा इसी स्पीड को नियंत्रित करने के लिए हम छोटे - छोटे कॉइलो को दो भागों ( बाहरी वाइंडिंग एवम अंदुरुनी वाइंडिंग ) में अरेंज करके रोटर की स्पीड को धीमा करते हैं ।

तो दोस्तों अब आप यह समझ गए होंगे कि हम पंखे में हम पंखे में वाइंडिंगो का उपयोग क्यों करते हैं इसके साथ यह भी समझ गए होंगे कि पंखे में कैपेसिटर का क्या उपयोग है ।

उम्मीद है दोस्तों आपको यह जानकारी पसंद आई होगी । अगर आपके मन में इससे संबंधित कोई शंका है या सुझाव हो तो हमें कमेंट करके जरूर बताएं । धन्यवाद ।


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